Sunday, 9 September 2018

सच्चा दानी

पेड़ किसी से नहीं पूछता
कहो, कहाँ से आए ?
वह तो बस कर देता छाया
चाहे जो सुस्ताए

खिलते समय न फूल सोचता
कौन उसे पाएगा
उसकी खुशबू अपनी साँसों में
भर इतराएगा

बादल से जब सहा न जाता
अपने जल का संचय
बस, वह बरस-बरस भर देता
नदियाँ, नहर, जलाशय

जो स्वभाव से ही दाता है
उन्हें न कोई भ्रम है
भेदभाव करते हैं वे ही
जिनकी पूजा कम है

-बाल स्वरुप राही
 (1936)

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