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Saturday, 9 February 2019

नानी का संदूक

नानी का संदूक निराला
हुआ धुएँ से बेहद काला
पीछे से वह खुल जाता है
आगे लटका रहता ताला

चंदन चौकी देखी उसमें
सूखी लौकी देखी उसमें
बाली जौ की देखी उसमें
खाली जगहों में है जाला
नानी का संदूक निराला

शीशी गंगा जल की उसमें
ताम्रपत्र, तुलसीदल उसमें
चींटा, झींगुर, खटमल उसमें
जगन्नाथ का भात उबाला
नानी का संदूक निराला

मिलता उसमें कागज कोरा
मिलता उसमें सुई व डोरा
मिलता उसमें सीप-कटोरा
मिलती उसमें कौड़ी माला
नानी का संदूक निराला

-श्रीनाथ सिंह