Saturday, 8 September 2018

एक बूँद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फिर फिर यही जी में लगी
हाय क्यों घर छोड़ कर मैं यों कढ़ी

मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में
चू पड़ूँगी या कमल के फूल में
बह गयी उस काल एक ऐसी हवा
वो समन्दर ओर आयी अनमनी
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वो उसी में जा गिरी मोती बनी

लोग यों ही, हैं झिझकते, सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर

         -अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध
           (1865-1947)

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